दुनिया तेजी से रिन्यूएबल एनर्जी की ओर बढ़ रही है और इसमें हाइड्रोजन को भविष्य का ईंधन माना जा रहा है। हाइड्रोजन से जब ऊर्जा बनती है तो उसका बाय-प्रोडक्ट केवल पानी होता है, यानी यह पूरी तरह साफ और पर्यावरण के अनुकूल है। लेकिन अब तक सबसे बड़ी समस्या यही रही है कि हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया महंगी, जटिल और पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी। खासतौर पर सोलर एनर्जी से हाइड्रोजन बनाने में इस्तेमाल होने वाला महंगा धातु प्लैटिनम एक बड़ी बाधा बना हुआ था। अब स्वीडन की एक बड़ी रिसर्च ने इस समस्या का ऐसा समाधान निकाला है, जो पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को बदल सकता है।

प्लैटिनम की मजबूरी खत्म, सोलर हाइड्रोजन में बड़ी सफलता
स्वीडन की प्रतिष्ठित Chalmers University of Technology के वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे बिना प्लैटिनम के सोलर एनर्जी से हाइड्रोजन गैस बनाई जा सकती है। अब तक सोलर लाइट और पानी की मदद से हाइड्रोजन बनाने के लिए प्लैटिनम को को-कैटेलिस्ट के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। प्लैटिनम न केवल बहुत महंगा है, बल्कि यह सीमित मात्रा में ही धरती पर उपलब्ध है। इसका खनन पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए जोखिम भरा माना जाता है, और इसका उत्पादन कुछ ही देशों तक सीमित है।
Chalmers यूनिवर्सिटी की इस नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने प्लैटिनम की जगह electrically conductive plastic यानी बिजली का संचालन करने वाले खास प्लास्टिक कणों का इस्तेमाल किया है। यह प्लास्टिक कण पानी में डालने पर सूरज की रोशनी के साथ प्रतिक्रिया करते हैं और हाइड्रोजन गैस का निर्माण करते हैं। लैब में किए गए प्रयोगों में यह साफ देखा गया कि पानी में छोटे-छोटे हाइड्रोजन के बुलबुले तेजी से बन रहे हैं, जो इस प्रक्रिया की सफलता को साबित करते हैं।
कैसे काम करती है यह नई टेक्नोलॉजी
इस तकनीक की असली ताकत advanced materials design में छिपी है। वैज्ञानिकों ने जिस प्लास्टिक का इस्तेमाल किया है, उसे conjugated polymers कहा जाता है। ये प्लास्टिक सूरज की रोशनी को बहुत अच्छी तरह अवशोषित करते हैं, लेकिन आमतौर पर पानी के साथ इनकी अनुकूलता कम होती है। रिसर्च टीम ने मॉलिक्यूलर लेवल पर बदलाव करके इस प्लास्टिक को ज्यादा water-compatible बना दिया है।
इसके अलावा वैज्ञानिकों ने इस प्लास्टिक को नैनोपार्टिकल्स के रूप में तैयार किया, जिससे पानी और रोशनी के साथ इसका संपर्क और बेहतर हो गया। इन नैनोपार्टिकल्स के अंदर polymer chains को ज्यादा loosely packed और hydrophilic बनाया गया, जिससे हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया तेज और प्रभावी हो गई। जब सिम्युलेटेड सूरज की रोशनी एक बीकर में मौजूद पानी और इन नैनोपार्टिकल्स पर डाली जाती है, तो कुछ ही पलों में हाइड्रोजन गैस के बुलबुले बनने लगते हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सिर्फ एक ग्राम इस प्लास्टिक मटेरियल से एक घंटे में करीब 30 लीटर हाइड्रोजन गैस बनाई जा सकती है। यह आंकड़ा मौजूदा प्लैटिनम आधारित सिस्टम्स के बराबर, बल्कि कई मामलों में उनसे बेहतर माना जा रहा है।
भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था में सोलर हाइड्रोजन की भूमिका
यह खोज सिर्फ एक लैब एक्सपेरिमेंट नहीं है, बल्कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था की दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है। रिसर्च टीम का मानना है कि प्लैटिनम जैसी दुर्लभ धातुओं पर निर्भरता खत्म होने से हाइड्रोजन उत्पादन की लागत में भारी कमी आएगी। इससे ग्रीन हाइड्रोजन को बड़े पैमाने पर बनाना संभव हो सकेगा और यह इंडस्ट्री, ट्रांसपोर्ट और पावर जनरेशन जैसे सेक्टर्स में अहम भूमिका निभा सकेगा।
फिलहाल इस प्रक्रिया में vitamin C का इस्तेमाल एक सहायक के रूप में किया जा रहा है जो रिएक्शन को रुकने से बचाता है। लेकिन वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य है कि केवल सूरज की रोशनी और पानी की मदद से, बिना किसी अतिरिक्त केमिकल के, पानी को सीधे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाए। रिसर्च लीडर प्रोफेसर एरगैंग वांग का कहना है कि यह लक्ष्य हासिल करने में अभी कुछ साल लग सकते हैं, लेकिन टीम सही दिशा में आगे बढ़ रही है।
यह भी पढ़े – 👉 Waaree 5kw Hybrid Solar Combo: एक ही पैकेज में पाए 10 पैनल, 3 बैटरी और इन्वर्टर का कॉम्बो, जानिए कीमत और पॉवर